उत्तरी क्षेत्र के ग्रामीण रैयतों ने शुक्रवार को उपायुक्त कार्यालय के समक्ष एक दिवसीय धरना दिया। उन्होंने मांग की कि 6 प्रस्तावित पंचायतों को तत्काल पंचायती राज व्यवस्था में शामिल किया जाए। ग्रामीणों ने चेतावनी दी कि यदि उनकी मांगें पूरी नहीं हुईं तो वे उग्र आंदोलन करेंगे, जिसकी जिम्मेदारी जिला प्रशासन की होगी।
भूमि अधिग्रहण का पुराना विवाद
धरना स्थल पर ग्रामीणों ने बताया कि करीब 60 वर्ष पूर्व 49 मौजा की जमीन चौथे इस्पात कारखाना निर्माण के नाम पर अधिग्रहित की गई थी। इनमें से 29 मौजा पर प्लांट और सेक्टर बसाए गए, जबकि 13 मौजा को वर्ष 2010 में पंचायती राज में शामिल कर लिया गया। मगर 7 मौजा—कुण्डौरी, शिबुटांड़, पंचौरा, महेशपुर, कन्फट्टा, बैधमारा और महुआर—अब तक पंचायत व्यवस्था से बाहर हैं।

पंचायत अधिकारों से वंचित ग्रामीण
ग्रामीणों का आरोप है कि इन गांवों में लाखों लोग निवास करते हैं। वे विधानसभा और लोकसभा चुनाव में प्रतिनिधि चुनते हैं, लेकिन पंचायत के अधिकार उनसे छीन लिए गए हैं। नतीजन वे सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं। आवास, शौचालय, छात्रवृत्ति और सरकारी ऋण जैसी योजनाएं भी यहां तक नहीं पहुंच पा रही हैं।
मुआवजा और पुनर्वास की कमी
गांववालों ने यह भी आरोप लगाया कि अधिग्रहित भूमि का उन्हें आज तक पूरा मुआवजा नहीं मिला और न ही पुनर्वास किया गया। उल्टा बोकारो इस्पात संयंत्र (BSL) अब उन्हीं जमीनों को निजी हाथों में बेचकर मुनाफा कमा रहा है। इससे ग्रामीणों में गहरा आक्रोश है।
ग्रामीणों की मुख्य मांगें
धरना के दौरान ग्रामीणों ने कई अहम मांगें रखीं। इनमें 6 प्रस्तावित पंचायतों को अधिसूचना और गजट प्रकाशित कर पंचायती राज में शामिल करना, ग्रामीण रैयतों के नाम से लगान रसीद काटने का आदेश जारी करना तथा भूमि अधिग्रहण और बंदरबांट की उच्च स्तरीय जांच कराना शामिल है। ग्रामीणों ने कहा कि जब तक उनकी समस्याओं का समाधान नहीं होगा, आंदोलन जारी रहेगा।
