Bokaro : धनबाद के पास हुए एक भीषण सड़क हादसे ने 31 वर्षीय बीएसएल कर्मचारी अजीत मिश्रा (बदला हुआ नाम) की जिंदगी को एक पल में बदल दिया। गंभीर हालत में जब उन्हें बोकारो जनरल अस्पताल (BGH) लाया गया, तब उनकी सांसें मानो टूटने की कगार पर थीं। सिर में अंदरूनी रक्तस्राव, कई हड्डियां टूट चुकी थीं और शरीर दर्द से कराह रहा था।

कोमा में डूबे, उम्मीदें होती गईं धुंधली
अस्पताल पहुंचते ही अजीत कोमा में चले गए। हर बीतता पल परिवार के लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं था। डॉक्टरों के सामने भी चुनौती बड़ी थी – एक जिंदगी को मौत के साए से वापस लाना।
सुबह 3 बजे शुरू हुई ‘जिंदगी की जंग’
ऐसे नाजुक समय में न्यूरोसर्जन डॉ. आनंद कुमार ने हिम्मत नहीं हारी। रात के सन्नाटे में सुबह 3 बजे ऑपरेशन शुरू हुआ। तीन घंटे तक चली इस जटिल सर्जरी में हर सेकंड कीमती था। डॉक्टरों के मुताबिक, अगर थोड़ी भी देरी होती, तो अजीत को बचाना संभव नहीं था।

‘गोल्डन ऑवर’ में टीम बनी भगवान
इस जंग में डॉक्टरों की पूरी टीम एकजुट होकर खड़ी रही। डॉ. सुनील कुमार, डॉ. सौरभ और डॉ. प्रेमनीत कुमार ने तुरंत फैसले लेकर इलाज को दिशा दी। जिस समय उम्मीदें लगभग खत्म हो रही थीं, उसी समय डॉक्टरों का यह समर्पण किसी चमत्कार से कम नहीं था।
50 दिनों की तपस्या, फिर लौटी जिंदगी
सर्जरी के बाद अजीत वेंटिलेटर पर रहे। दो दिन बाद जब उन्होंने पहली बार आंखें खोलीं, तो वह पल परिवार के लिए किसी नए जन्म जैसा था। करीब 50 दिनों तक इलाज, दर्द, संघर्ष और फिजियोथेरेपी के बाद आखिरकार 28 मार्च 2026 को उन्हें अस्पताल से छुट्टी मिल गई। डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ की अथक मेहनत ने यह साबित कर दिया कि अगर हौसला और सही समय पर इलाज मिले, तो मौत को भी मात दी जा सकती है।

