Bokaro: बोकारो इस्पात संयंत्र (BSL) ने विस्थापितों को स्वरोजगार से जोड़ने की दिशा में “बड़ी पहल” करने का दम भर रही है। शहर के विभिन्न सेक्टरों में 96 दुकानों के आवंटन के लिए 23 मार्च से 1 अप्रैल तक फॉर्म बेचे गए और कुल 1771 आवेदन फॉर्म बिक गए। यानी उम्मीदें हजारों की, लेकिन दुकानें गिनी-चुनी।

जगह वही, जहाँ ग्राहक कम
दिलचस्प यह है कि जिन शॉपिंग सेंटरों में ये दुकानें हैं, वहां आज के ऑनलाइन और मॉल के दौर में लोगों की आवाजाही पहले ही कम हो चुकी है। कई जगहों की हालत ऐसी है कि क्वार्टरों की तरह शॉपिंग सेंटर भी जर्जर अवस्था में पहुंच चुके हैं। बीएसएल प्रबंधन कई सालो से शॉपिंग सेंटरों का रखरखाव अच्छे से नहीं कर रहा है। ऊपर से बीएसएल टाउनशिप में अवैध गुमटियों का जाल, जहां जरूरत का हर सामान आसानी से मिल जाता है- ऐसे में नई दुकानें खुलने के बाद ग्राहक आएंगे या नहीं, यह बड़ा सवाल है।
कागजों में पारदर्शिता, जमीन पर चुनौती
बीएसएल की ओर से 4 मई 2026 को लॉटरी सिस्टम से “कथित पारदर्शी और पूरी तरह निष्पक्ष” आवंटन का भरोसा दिलाया गया है। चयनित लोगों को 11 माह का लाइसेंस मिलेगा, जिसे आगे भी बढ़ाया जा सकेगा। लेकिन जिन शॉपिंग सेंटरों में पहले से ही अवैध कब्जेधारी आराम फरमा रहे हैं, वहां खाली कराने से लेकर आवंटन तक की प्रक्रिया कितनी “सहज” होगी, यह देखने लायक ही होगा। कई शॉपिंग सेंटर में तो लोग जाना भी जरूरी नहीं समझते हैं। न उनके कैंपस में बिजली हैं। बीएसएल अपनी झोली भरने के लिए विस्थापितों से किराया और बिजली बिल तो वसूल ही लेगा, पर क्या विस्थापितों की दुकानें उन बिजली चोरी कर मजे से चल रही फ्री की अवैध गुमटियों के सामने टिक भी पाएंगी। ये सवाल गहरा है, पर है।

फिलहाल फॉर्म बिकने की खुशी
नगर प्रशासन विभाग के लिए राहत की बात यह है कि 96 दुकानों के लिए 1771 फॉर्म बिक गए। इससे न केवल आवेदन शुल्क से आमदनी हुई, बल्कि विस्थापितों के बीच एक सकारात्मक संदेश भी गया कि प्रबंधन उनके रोजगार को लेकर “चिंतित” है। साथ ही, बीएसएल के टॉप अधिकारियों के सामने नगर प्रसाशन के अधिकारियों ने इस स्कीम को अपनी उपलब्धि बताकर क्रेडिट लिया और शाबाशी पाई।
आवेदन की प्रक्रिया जारी
इच्छुक आवेदक 2 से 6 अप्रैल 2026 तक एलआरए कार्यालय में आवेदन जमा कर सकते हैं। योजना में नेबरहुड, लो-कॉस्ट और पान-सिगरेट दुकानों का प्रावधान है।
पहले भी मिले ‘मौके’
इससे पहले सेक्टर-5 हटिया में एक और सिटी सेंटर सेक्टर-4 में दो पार्किंग स्टैंड विस्थापितों को दिए जा चुके हैं। जो करीब-करीब फ्लॉप साबित हुए है। अब देखना यह है कि नई दुकानों का यह “मौका” वाकई रोजगार बनता है या फिर एक और ‘आशा की किरण’ बनकर रह जाता है।

