Bokaro: बोकारो स्टील प्लांट में अब महंगे कोक की जगह पिसे हुए कोयले का इस्तेमाल बढ़ने जा रहा है। इसके लिए बीएसएल ने एक ऐसी तकनीक को सफलतापूर्वक चालू किया है, जिसमें 650 मीटर लंबी पाइपलाइन के जरिए कोल डस्ट को सीधे ब्लास्ट फर्नेस-3 तक पहुंचाया जाएगा। खास बात यह है कि करीब चार महीने में तैयार इस परियोजना से हर साल लगभग 100 करोड़ रुपये की लागत बचत होने का अनुमान है।

15 अगस्त को इस कोल डस्ट इंजेक्शन (CDI) सिस्टम का सफल कमीशनिंग किया गया। बीएसएल के लिए यह उपलब्धि इसलिए भी अहम है क्योंकि परियोजना की शुरुआत जिस उद्देश्य से हुई थी, उसका इस्तेमाल बाद में पूरी तरह बदलना पड़ा।
जिस सिस्टम की मंजिल BF-4 और BF-5 थी, वह BF-3 तक पहुंचा
दरअसल, शुरुआत में यह सिस्टम ब्लास्ट फर्नेस-4 और 5 में कोल डस्ट की करीब 10 टन प्रति घंटे की कमी दूर करने के लिए तैयार किया जा रहा था। इसी बीच BF-5 को रणनीतिक रूप से बंद करने की प्रस्तावित योजना सामने आई। इसके बाद बीएसएल प्रबंधन ने पूरी योजना को नए सिरे से तैयार किया और सिस्टम को नए ब्लास्ट फर्नेस-3 से जोड़ दिया। BF-3 में अपनी अलग कोल मिलिंग सुविधा नहीं थी। ऐसे में यह सिस्टम उसके लिए महत्वपूर्ण ईंधन आपूर्ति व्यवस्था बन गया।

650 मीटर की दूरी… और पाइपलाइन के भीतर दौड़ता कोल डस्ट
इस परियोजना की असली तकनीकी चुनौती बीपीएससीएल से बीएफ-3 तक पिसे हुए कोयले को पहुंचाना थी। इसके लिए करीब 650 मीटर लंबी DN250 पाइपलाइन तैयार की गई। पाइपलाइन में कोल डस्ट कहीं जम न जाए और प्रवाह बाधित न हो, इसके लिए नाइट्रोजन के दबाव और कोयले के प्रवाह का बेहद सटीक संतुलन बनाया गया है। आगे 24-वे स्प्लिट सिस्टम के जरिए कोल डस्ट को BF-3 के अलग-अलग ट्यूयर्स तक पहुंचाया जाता है। यानी बीपीएससीएल में तैयार हुआ पिसा हुआ कोयला अब पाइपलाइन के रास्ते सीधे ब्लास्ट फर्नेस की प्रक्रिया का हिस्सा बनेगा।
10 TPH के लिए डिजाइन, टेस्ट में 15 TPH तक क्षमता
सिस्टम को 10 टन प्रति घंटे की क्षमता के हिसाब से डिजाइन किया गया था। लेकिन कमीशनिंग के दौरान इसकी सैद्धांतिक कन्वेइंग क्षमता 15 TPH तक पहुंच गई। हालांकि वास्तविक उत्पादन क्षमता फिलहाल बीपीएससीएल की बॉल मिल की क्षमता से सीमित है। इसके बावजूद शुरुआती प्रदर्शन को परियोजना की बड़ी तकनीकी सफलता माना जा रहा है। सिस्टम को पूरी तरह ऑटोमेटेड बनाया गया है। पीएलसी आधारित नियंत्रण, दो चरणों वाला नाइट्रोजन प्रेशर रेगुलेशन और अलग पर्जिंग सिस्टम लगाया गया है, ताकि पाइपलाइन में ब्लॉकेज का खतरा कम रहे।
दो ब्लो टैंक संभालते हैं लगातार सप्लाई
सिस्टम के केंद्र में दो ब्लो टैंक लगाए गए हैं। प्रत्येक की क्षमता 1.4 घन मीटर है। दोनों टैंक सात चरणों वाले स्वचालित चक्र में काम करते हैं। इसका उद्देश्य कोल डस्ट की आपूर्ति को लगातार और बिना झटके के बनाए रखना है। यही व्यवस्था लंबे समय तक ब्लास्ट फर्नेस को स्थिर ईंधन आपूर्ति देने में मदद करेगी।
चार महीने में पूरा हुआ पूरा प्रोजेक्ट
इस परियोजना की सबसे उल्लेखनीय बात सिर्फ इसकी तकनीक नहीं, बल्कि इसकी रफ्तार भी है। कॉन्सेप्ट से कमीशनिंग तक पूरा काम महज चार महीने में पूरा किया गया। इस दौरान बीपीएससीएल के कोल हैंडलिंग प्लांट में डंपर रैंप तैयार करने से लेकर कन्वेयर सिस्टम में बदलाव, पाइपलाइन बिछाने, इलेक्ट्रिकल सिस्टम और पीएलसी ऑटोमेशन तक कई स्तरों पर काम किया गया।
कोक की जगह कोल डस्ट, और करीब 100 करोड़ की संभावित बचत
इस पूरी कवायद का सीधा असर बीएसएल की लागत पर पड़ने की उम्मीद है। कोल डस्ट इंजेक्शन के जरिए महंगे कोक की जरूरत कम की जा सकेगी। बीएसएल के मुताबिक, 0.85 के Coke Replacement Ratio के आधार पर इस सिस्टम से सालाना करीब 100 करोड़ रुपये की लागत बचत होने का अनुमान है। स्टील उत्पादन में ईंधन लागत एक बड़ा खर्च होती है। ऐसे में यदि यह बचत अनुमान के अनुरूप हासिल होती है तो CDI सिस्टम बीएफ-3 की परिचालन अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
कई टीमों ने मिलकर बदली पूरी परियोजना की दिशा
परियोजना को निदेशक प्रभारी और ईडी (वर्क्स) के मार्गदर्शन तथा सीजीएम (यूटिलिटीज) के नेतृत्व में पूरा किया गया। पाइपलाइन और इरेक्शन कार्य में जनिशर इमाम, एसडब्ल्यू किस्पोट्टा, आरएन देव और वीके शर्मा की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इलेक्ट्रिकल कार्य मनीष स्नेही की टीम ने संभाला, जबकि पीएलसी और ऑटोमेशन सिस्टम में बसंत केशव और मंतोष कुमार की टीम ने योगदान दिया। अनुपम रॉय और वेंकटेश कुमार समेत अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों का भी परियोजना में योगदान रहा।
चार महीने, 650 मीटर पाइपलाइन, 15 TPH तक परीक्षण क्षमता और सालाना करीब 100 करोड़ रुपये की संभावित बचत – बीएसएल का यह CDI प्रोजेक्ट तकनीकी बदलाव के साथ-साथ लागत घटाने की दिशा में भी बड़ा कदम है।
Frequently Asked Question
Bokaro Steel Plant (BSL) has commissioned a Coal Dust Injection (CDI) system at Blast Furnace-3 to increase the use of pulverised coal and reduce dependence on costly coke.
The Coal Dust Injection system was successfully commissioned on August 15, 2026.
The system uses a 650-metre-long DN250 pipeline to transport pulverised coal to Blast Furnace-3.
The system was designed for a capacity of 10 tonnes per hour (TPH). During commissioning trials, it demonstrated a theoretical conveying capacity of up to 15 TPH.
BSL expects the CDI system to generate approximately Rs 100 crore in annual cost savings, based on a Coke Replacement Ratio of 0.85.
The system was initially planned for Blast Furnaces 4 and 5. Following the proposed strategic closure of BF-5, BSL redesigned the project and connected the system to BF-3, which did not have its own coal milling facility.
Pulverised coal is transported through a 650-metre pipeline using controlled nitrogen pressure and coal flow. A 24-way splitting system then distributes the coal dust to different tuyeres of BF-3.
The entire project, from concept development to commissioning, was completed in approximately four months.
The system features PLC-based automation, two-stage nitrogen pressure regulation, an automated purging system and two 1.4-cubic-metre blow tanks for continuous coal dust supply.
