प्रतिमा स्थापना के दो वर्ष पूरे होने पर मिथिला सांस्कृतिक परिषद ने अर्पित की भावांजलि

Bokaro : सेक्टर-4 ई स्थित मिथिला अकादमी पब्लिक स्कूल परिसर में स्थापित महाकवि विद्यापति की प्रतिमा के दो वर्ष पूरे होने के अवसर पर मिथिला सांस्कृतिक परिषद की ओर से बुधवार देर शाम भव्य पुष्पांजलि समारोह का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में समाज के प्रबुद्धजनों, परिषद के पदाधिकारियों और सदस्यों ने प्रतिमा पर पुष्प अर्पित कर महाकवि विद्यापति को श्रद्धापूर्वक नमन किया।
जय मिथिला-जय मैथिली के उद्घोष से गूंजा परिसर
समारोह के दौरान पूरा परिसर महाकवि विद्यापति के अमर गीतों और ‘जय मिथिला-जय मैथिली’ के उद्घोष से गुंजायमान रहा। कार्यक्रम की शुरुआत परिषद के महासचिव नीरज चौधरी ने महाकवि विद्यापति को नमन करते हुए की। उन्होंने समारोह की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए उपस्थित अतिथियों और सदस्यों का स्वागत किया।

विद्यापति मिथिला की आत्मा और सनातन संस्कृति के संवाहक
परिषद के अध्यक्ष जय प्रकाश चौधरी ने कहा कि मैथिली साहित्य के शिखर पुरुष, भक्ति और शृंगार के अद्वितीय शब्द-शिल्पी तथा ‘मैथिल कोकिल’ के नाम से प्रसिद्ध महाकवि विद्यापति केवल युगद्रष्टा कवि नहीं थे, बल्कि वे मिथिला की आत्मा और सनातन संस्कृति के अमर संवाहक हैं। उनकी रचनाएं और शिव भक्ति की परंपरा आज भी समाज को संस्कारित एवं आध्यात्मिक रूप से आलोकित कर रही हैं।
विद्यापति की भक्ति और उगना प्रसंग का किया उल्लेख
निदेशक मंडल संयोजक एवं मिथिला एकेडमी पब्लिक स्कूल के अध्यक्ष राजेन्द्र कुमार, परिषद निदेशक मंडल सदस्य कृष्ण चन्द्र झा, विजय कुमार झा, विद्यालय सचिव दिलीप झा और उपाध्यक्ष बटोही कुमर समेत अन्य वक्ताओं ने विद्यापति को अवतारी महापुरुष बताया। वक्ताओं ने कहा कि उनकी अनन्य साधना और भक्ति का ही प्रभाव था कि मान्यता के अनुसार देवाधिदेव महादेव उगना का रूप धारण कर उनके सेवक बने।
मैथिली को वैश्विक पहचान दिलाने में विद्यापति का योगदान
वक्ताओं ने कहा कि मैथिली भाषा को व्यापक पहचान दिलाने में विद्यापति के पदों और नचारी गीतों का योगदान अतुलनीय है। उनकी रचनाएं प्रेम, समरसता, मर्यादा और अटूट ईश्वर भक्ति का संदेश देती हैं। विद्यापति की साहित्यिक और आध्यात्मिक विरासत आज की नई पीढ़ी के लिए भी प्रेरणा और मार्गदर्शन का स्रोत है।
विद्यापति के गीतों से सजा सांस्कृतिक कार्यक्रम
परिषद के सांस्कृतिक कार्यक्रम निदेशक अरुण पाठक तथा वरिष्ठ रंगकर्मी सह विद्यालय के संयुक्त सचिव सुनील मोहन ठाकुर ने महाकवि विद्यापति के प्रसिद्ध गीतों की प्रस्तुति दी। ‘उगना रे मोरा…’ और ‘माधव कते तोर करब बड़ाई’ जैसे गीतों ने कार्यक्रम में मौजूद लोगों को भावविभोर कर दिया और पूरे माहौल को भक्तिमय बना दिया।
अयोध्या के बाद पुनौरा धाम का विकास सांस्कृतिक पुनर्जागरण
समारोह में उपस्थित प्रबुद्धजनों ने मिथिला के सांस्कृतिक पुनर्जागरण पर भी चर्चा की। वक्ताओं ने अयोध्या में प्रभु श्रीराम के भव्य मंदिर निर्माण के बाद माता जानकी की प्राकट्य स्थली सीतामढ़ी के पुनौरा धाम को केंद्र एवं राज्य सरकार द्वारा विकसित किए जाने की योजना पर प्रसन्नता व्यक्त की।
पुनौरा धाम से मिथिलांचल को मिलेगी नई पहचान
वक्ताओं ने कहा कि मिथिला और अवध का यह पावन संबंध सनातन चेतना का महत्वपूर्ण केंद्र है। पुनौरा धाम का समग्र विकास संपूर्ण मिथिलांचल के सांस्कृतिक गौरव को नई पहचान देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। इससे मिथिला की ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय एवं वैश्विक स्तर पर मजबूती मिलेगी।
मैथिली भाषा और संस्कृति को सहेजने का लिया संकल्प
कार्यक्रम के अंत में उपस्थित लोगों ने अपनी समृद्ध भाषाई एवं सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित रखने और नई पीढ़ी को मैथिली भाषा तथा महाकवि विद्यापति के विचारों से जोड़ने का संकल्प दोहराया। कार्यक्रम में उपाध्यक्ष श्रवण कुमार झा, मिथिला महिला समिति की अध्यक्ष पूनम मिश्रा, मिथिला एकेडमी के पूर्व सचिव रवीन्द्र झा के अलावा ए.के. मिश्र, अविनाश झा ‘अवि’, शंभु झा, प्रदीप झा, गणेश झा, गोविन्द कुमार झा, दिलीप ठाकुर, गंगेश कुमार पाठक, अरविंद मिश्रा सहित दर्जनों लोग मौजूद रहे।


