Bokaro: “मेरा पति एक दिन जरूर लौटेगा…” 39 वर्षीय मालती देवी के लिए यह सिर्फ एक उम्मीद नहीं, बल्कि जिंदगी जीने का सहारा था। पति के लापता होने के बाद बीते 20 वर्षों में न जाने कितनी रातें उन्होंने इसी भरोसे में काटीं कि किसी दिन घर के दरवाजे पर उनका पति खड़ा होगा। मंगलवार को आखिरकार वह दिन आ गया। दो दशक से परिवार से दूर रहे 46 वर्षीय परशुराम महतो अपने घर लौट आये।

गोविंदपुर गांव, बोकारो थर्मल क्षेत्र निवासी परशुराम महतो की वापसी ने पूरे परिवार को भावुक कर दिया। राजस्थान के भरतपुर स्थित अपना घर आश्रम के प्रयास से उनकी पहचान हुई और पुलिस की मदद से उनके परिवार तक पहुंच बनाई गयी। वर्षों से बिछड़े बेटे, भाई और पति के लौटने की खबर मिलते ही परिवार की आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े।

2006 में राजस्थान में मिले थे, अपना नाम तक नहीं बता पाये
परशुराम की जिंदगी की यह कहानी मार्च 2006 से शुरू होती है। राजस्थान के कुचामन सिटी में मानसिक रूप से अस्वस्थ हालत में एक व्यक्ति मिला था। वह न अपना नाम बता पा रहा था और न ही यह बता पा रहा था कि वह कहां का रहने वाला है। उसे भरतपुर के अपना घर आश्रम शेल्टर होम लाया गया। पहचान नहीं होने के कारण आश्रम ने उसे ‘प्रभुजी विष्णु’ नाम दिया। आश्रम में उसका इलाज शुरू हुआ। गंभीर बीमारी के कारण उसका ऑपरेशन भी किया गया। धीरे-धीरे इलाज के साथ उसकी मानसिक स्थिति में सुधार आने लगा और याददाश्त के बिखरे हुए तार जुड़ने लगे। इसी दौरान उसने बताया कि वह झारखंड के बोकारो का रहने वाला है। यह छोटी-सी जानकारी उसके परिवार तक पहुंचने की सबसे बड़ी कड़ी बनी।
‘नाम भी नहीं बता पाते थे’, आश्रम संस्थापक ने सुनायी कहानी
अपना घर आश्रम संस्था के संस्थापक ब्रज मोहन भारद्वाज ने बताया कि जब परशुराम आश्रम पहुंचे थे, तब वह अपनी पहचान बताने की स्थिति में नहीं थे। उन्होंने कहा, “जब उन्हें आश्रम लाया गया था, तब वह अपना नाम तक नहीं बता पा रहे थे। हमने उनका नाम विष्णु रखा। इलाज के बाद उनकी स्थिति में सुधार हुआ। धीरे-धीरे उन्हें अपने बारे में कुछ बातें याद आने लगीं। उन्होंने बताया कि वह बोकारो, झारखंड के रहने वाले हैं।”
इसके बाद आश्रम की ओर से स्थानीय पुलिस और प्रशासन से संपर्क किया गया। पुलिस की मदद से उस व्यक्ति के गांव और परिवार की तलाश शुरू हुई। जांच आगे बढ़ी तो कड़ी बोकारो के बेरमो अनुमंडल के गोविंदपुर गांव तक पहुंच गयी।
रोजगार की तलाश में मुंबई गये थे, फिर कभी नहीं लौटे
परशुराम के बड़े भाई कामेश्वर महतो के अनुसार, करीब 20 साल पहले परशुराम रोजगार की तलाश में मुंबई गये थे। वह बिजली मिस्त्री का काम करते थे और रोजगार को लेकर तनाव में भी थे। वह कुछ दोस्तों के साथ मुंबई गये थे। उनके साथ गये दोस्त बाद में वापस लौट आये, लेकिन परशुराम नहीं लौटे। परिवार ने कई वर्षों तक उनकी तलाश की। कामेश्वर बताते हैं कि करीब पांच-छह साल तक परिवार ने अपने स्तर पर उन्हें खोजने की कोशिश की। बाद में तलाश बंद करनी पड़ी, लेकिन उम्मीद पूरी तरह कभी नहीं मरी। “हमने तलाश तो छोड़ दी थी, लेकिन भगवान से हमेशा यही प्रार्थना करते थे कि वह जहां भी हों, सुरक्षित हों,” कामेश्वर ने कहा।
पिता की मौत हो गयी, मां बेटे की राह देखती रहीं
परशुराम के लापता होने का दर्द परिवार ने दो दशक तक अपने भीतर ढोया। उनके पिता रेवतलाल महतो की मौत बेटे की कोई खबर मिले बिना हो गयी। तीन भाइयों में सबसे छोटे बेटे के बारे में जानकारी नहीं मिलने का दर्द उनके साथ ही चला गया। मां रत्नी देवी भी बेटे को याद कर अक्सर भावुक हो जाती थीं। परिवार को समय के साथ यह स्वीकार करना पड़ा था कि शायद परशुराम अब कभी वापस नहीं आयेंगे। लेकिन मां की यादों में वह आज भी जिंदा थे।
पत्नी ने 20 साल तक नहीं छोड़ा सुहाग का साथ
इस पूरी कहानी का सबसे भावुक अध्याय परशुराम की पत्नी मालती देवी से जुड़ा है। शादी के बाद उनके कोई संतान नहीं हुई। पति के लापता होने के बाद भी मालती ने दूसरी शादी नहीं की। उन्होंने सिंदूर लगाना नहीं छोड़ा। करवा चौथ का व्रत भी करती रहीं। आसपास के लोग भले ही इसे बीतते समय के साथ असंभव उम्मीद मानने लगे हों, लेकिन मालती के लिए उनका पति जीवित था और एक दिन घर लौटने वाला था। बीस वर्षों तक उन्होंने इसी विश्वास के साथ जिंदगी बितायी। जिस दरवाजे से परशुराम कभी बाहर निकले थे, उसी दरवाजे से उनके वापस लौटने की उम्मीद मालती ने कभी पूरी तरह नहीं छोड़ी।
पुलिस के फोन ने पहले दिया अविश्वास, फिर खुशी
जब बोकारो थर्मल थाना से कामेश्वर महतो को फोन आया कि उनके भाई परशुराम का पता चल गया है, तो पहले उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ। कामेश्वर ने बताया, “हम लोग स्तब्ध रह गये। समझ ही नहीं आया कि क्या सुन रहे हैं। इसके बाद हम तुरंत थाना पहुंचे। पुलिस अधिकारियों ने वीडियो कॉल के माध्यम से परशुराम से बात करायी।”
20 साल बाद स्क्रीन पर भाई का चेहरा देखते ही कामेश्वर अपने आंसू नहीं रोक सके। दूसरी तरफ घर में मां और पत्नी मालती भी रो पड़ीं। “हम खुशी से रोने लगे। उसकी पत्नी और मां भी रो रही थीं। इसके बाद हमने बिना देर किये अपनी गाड़ी से राजस्थान जाने का फैसला किया, ताकि उसे वापस घर ला सकें,” कामेश्वर ने कहा।
घर पहुंचा तो दीपावली जैसा माहौल
दो दशक के इंतजार के बाद जब परशुराम अपने घर पहुंचे तो पूरा परिवार भावुक हो उठा। रिश्तेदारों के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया। उनके बहनोई टिकेंद्र महतो समेत परिवार के अन्य सदस्य भी घर पहुंचे। कामेश्वर ने कहा, “घर में दीपावली जैसा माहौल है, जबकि दीपावली नहीं है।” लेकिन मालती के लिए यह किसी त्योहार से कम भी नहीं था। जिस पति के लौटने की उम्मीद में उन्होंने 20 साल गुजार दिये, वह आखिरकार उनके सामने था।
यह सिर्फ एक लापता व्यक्ति के घर लौटने की कहानी नहीं है। यह एक पत्नी के अटूट विश्वास, एक मां की उम्मीद, एक भाई की अधूरी तलाश और एक परिवार के दो दशक लंबे इंतजार के खत्म होने की कहानी है। समय ने परिवार से बहुत कुछ छीन लिया। पिता नहीं रहे, मां बूढ़ी हो गयीं और जिंदगी के 20 साल गुजर गये। लेकिन मालती का विश्वास नहीं टूटा। मंगलवार को जब परशुराम ने घर की चौखट पर कदम रखा, तो दो दशक से बंद पड़ी उम्मीद का दरवाजा भी खुल गया।
बीस साल बाद परशुराम घर लौटे हैं। पीछे छूट गयी है इंतजार की वह लंबी कहानी, जिसे मालती ने कभी खत्म नहीं होने दिया।

