Bokaro: बोकारो के सेक्टर-1 स्थित राम मंदिर मार्केट के पास शनिवार को सड़क किनारे लाल रंग के ड्रैगन फ्रूट की बिक्री ने लोगों का ध्यान खींच लिया। कभी विदेशी और महंगा माना जाने वाला यह फल अब स्थानीय बाजारों में आम होता जा रहा है, जैसे मूंगफली की तरह आसानी से उपलब्ध हो। यह बदलाव केवल फल के प्रसार का नहीं, बल्कि कृषि में आए नए सोच और परिवर्तन का संकेत है।

लॉकडाउन में बदली सोच, ‘मन की बात’ से मिली प्रेरणा
चांदो पंचायत के उत्क्रमित विद्यालय में कार्यरत शिक्षक दिनेश कुमार सिंह (45) और बलदेव मांझी (58) ने कोरोना लॉकडाउन के दौरान खाली समय को अवसर में बदला। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘मन की बात’ कार्यक्रम से प्रेरणा लेकर दोनों ने ड्रैगन फ्रूट की खेती शुरू करने का निर्णय लिया।

हैदराबाद से मंगाए 2000 पौधे, 8.5 लाख रुपये का निवेश
दिनेश कुमार सिंह बताते हैं कि लॉकडाउन के दौरान जब स्कूल बंद थे, तब उन्होंने इंटरनेट पर रिसर्च कर ड्रैगन फ्रूट खेती की संभावनाएं तलाशीं। इसके बाद दोनों ने हैदराबाद से करीब 2,000 पौधे मंगाए और लगभग 8.5 लाख रुपये का निवेश किया। शुरुआत में यह सफर आसान नहीं था। मिट्टी परीक्षण, सिंचाई व्यवस्था और लगातार प्रयोगों के बीच कई चुनौतियां सामने आईं, लेकिन दोनों शिक्षकों ने हार नहीं मानी। मेहनत और धैर्य ने धीरे-धीरे सफलता की राह खोल दी।
अब हर साल 10 टन उत्पादन, देशभर में बढ़ी मांग
आज उनका खेत हर साल करीब 10 टन ड्रैगन फ्रूट का उत्पादन कर रहा है, जिसकी सप्लाई रांची, जमशेदपुर, रामगढ़, बिहार के सासाराम और कोलकाता तक हो रही है। यह मॉडल अब एक सफल कृषि उद्यम के रूप में उभर चुका है। बलदेव मांझी के अनुसार ड्रैगन फ्रूट की फसल 15 से 20 वर्षों तक उत्पादन देती है और साल में कई बार पैदावार होती है। एक एकड़ से 8 से 9 लाख रुपये की सालाना आय ने इसे बेहद लाभकारी खेती साबित किया है।
शिक्षकों की मेहनत बनी किसानों के लिए प्रेरणा
दिनेश कुमार सिंह बताते हैं कि पहली बार फूल आने का अनुभव उनके लिए बेहद भावुक क्षण था। डीसी बोकारो अजय नाथ झा ने भी कहा कि यह कहानी दिखाती है कि संकट के समय में अवसर तलाशने वाले ही बदलाव की नई इबारत लिखते हैं।

